विनीत शिष्य – Gracious pupil

उज्जयिनी नगरी के नज़दिक एक उद्यान मे मुनि चंडरुद्राचार्य अपने शिष्यो के साथ पधारे। अचानक से एक युवान अपने मित्रो के साथ आया और मुनि से याचना की, “हे भगवन! मुझे संसार सागर से बचा लो।” लेकिन उसके मित्रो ने कहा, “यह तो मज़ाक कर रहा है।” इस पर चंडरुद्राचार्य ने क्रोधावेश मे युवान को आज्ञा कर दी, “मैं तुझे अभी दीक्षा देता हूँ ” और तुरंत ही अपने हाथो से युवान का मुंडन कर दिया। यह देख मित्र तो डर के भाग गए, लेकिन नव-दीक्षित युवान ने गुरु से विनती की, “मेरे परिचित लोग आ जाएँगे तो आपको परेशान करेंगे, यहा रहना उचित नहीं, हमे अन्य स्थल पर चले जाना चाहिए।”

क्रोध मे धुत गुरु उसी शिष्य के कंधे पर बैठकर विहार करने लगे। चलते-चलते शाम ढलने लगी, रास्ते मे अंधकार के कारण स्पष्ट नहीं दिखने से शिष्य के पैर आड़े-टेढ़े पड़ने लगे। फिर से गुरु ने क्रोधित होकर डांटा लेकिन शिष्य ने कठोर वचन संभाव से पी लिए। लेकिन जब एक खड्डे मे शिष्य का पैर पड़ा तब तो गुरु के क्रोध ने सारी सीमा तोड़ दी। शिष्य के ताजे मुंडित मस्कट पर लकड़ी फटकार दी, सिर से लहू बहने लगा। अब भी शिष्य अपनी कोमल वाणी से गुरु को शांत करने लगा।

Raja_Ravi_Varma_-_Sankaracharya

इतना सब कुछ सहने के बाद भी गुरु के प्रति उच्च क्षमाभाव से शिष्य के कर्म क्षय हो गए, उसे केवल-ज्ञान प्राप्त हुआ, केवल-ज्ञान यानि सम्पूर्ण ज्ञान! केवल-ज्ञान के प्रकाश मे अब पैर सीधे पड़ने लगे। गुरु ने टकोर की, ‘मार मे ही सार है!’ तब शिष्य ने कहा, “आपकी कृपा से उजाला हो गया गुरुदेव!” यह वचन सुनकर आचार्य को समाज आ गया और उसने अपने केवल-ज्ञानी शिष्य की क्षमा मांगी और शिष्य की नम्रता, क्षमा, समता, सहिष्णुता की प्रशंसा की। गुरु पश्चाताप की भावना मे डूब गए और दूसरी ओर गंभीर ईज़ा के कारण केवल-ज्ञानी शिष्य ने देह त्याग किया, मोक्ष-प्राप्ति कर ली।

कठोर तो कोई भी हो सकता है, लेकिन जो विनयवान होता है, वह गुणी होता है, वीर होता है, महान होता है। इसीलिए तो कहा गया है, “क्षमा विरस्य भूषणम”।