प्रेम एक शाश्वत मुल्य है

एक बार महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठे हुए थे ! बात चल रही थी की मनुष्य के संत होने और देवता होने की प्रकिर्या कैसे बनती है ! यह कैसे माना जाये की यह आदमी संत हो गया है या देवता की श्रेणी में पहुंच गया है!

इस पर महात्मा बुद्ध ने जवाब दिया की जीवन में प्रेम एक शाश्वत मूल्य होता है ! जब मनुष्य के प्रेम के दायरे में सभी लोग आ जातें हैं, भले ही किसी जाती, धर्म,स्थान और नस्ल से सम्बन्ध रखते हों तो आदमी संत की श्रेणी में आ जाता है, और जब दुश्मन भी उसके प्रेम के दायरे में आ जातें हैं तो आदमी देवता की श्रेणी में आ जाता है !
 कितना सटीक उत्तर दिया महात्मा बुद्ध ने ! आज हजारों लोग अपने नाम के आगे संत शब्द का इस्तेमाल करते हैं ! परन्तु क्या उनका आचरण संत के लायक है ? उनके अनुयायियों को छोडकर बाकि लोगों की राय उनके बारे में कैसी होती है ?

 इसी तरह सामाजिक और आर्थिक व्यवहार में बेईमान आदमी चाहे कितने मन्दिरों का चक्कर लगा ले या कितने सत्संग घूम ले वह कभी भी अपने स्तर से उपर नही उठ सकता ! 
मानव जीवन का उद्देश्य मूल्यों का संचय करना होता है और एक आदमी यह कहकर की बिजनस की बात अलग है अपने व्यक्तित्व के दो हिस्से नही कर सकता ! 

मूल्यों का संचय एक लगातार और विचार और आचरण से जुडा हुआ कार्य है इसे हिस्सों में नही बांटा जा सकता !इसलिय आदमी को मुश्किल समय में भी बिज़नस के स्थापित सिद्धांतो को नही छोड़ना चाहिए !उसका सही आचरण ही उसको मुश्किलों से निकालेगा और उसके व्यवहार से ही उसको सहायता मिलेगी !

समय गुजर जाता है लेकिन नैतिक पतन से उबरना बहुत मुश्किल होता है !