आत्मदमन की प्रेरणा- Motivation for Self Control

एक वन मे अनेक हाथीणीओ के साथ यूथपति गजराज रहता था। न जाने क्यो,  जितने नए बच्चे जन्म लेते, उन सभी को वह मार डालता! उसके डर से एक हाथीणी ने भागकर, उसी वन मे एक तपस्वी के आश्रम मे गजशिशु को जन्म दिया… समय के चलते गजशिशु तो ऋषिकूमारों के साथ घुल-मिल गया, अपनी सूंढ से आश्रम के उद्यान को पानी से सींचने लगा, तो ऋषिकुमारों ने गजशिशु का नाम ‘ सेचनक ‘ रख दिया!Elephant

सेचनक के युवान होने पर, सशक्त बनकर उसने घातक यूथपति को मार डाला और खुद यूथपति बन गया। वर्षो से जो डर फैला था वह समाप्त हुआ। किन्तु बदला लेने के बाद भी सेचनक का गुस्सा शांत नहीं हुआ, उसने आवेश मे आकर आश्रम को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया! जैसे तैसे तपस्वियों ने अपनी जान बचाई और महाराजा श्रेणिक को फरियाद की।

तुरंत ही उनके सैनिक सेचनक को पकड़ने के लिए निकाल पड़े। एक देव ने यह सब देखा और विचार किया, “श्रेणिक राजा इस हाथी को पकड़कर, बांधकर उसे मारेंगे।” देव ने अपनी शक्तिओ का प्रयोगकर सेचनक के कान मे कहा, “राजा तुझे मारे, उससे पहले तू स्वयं ही अपने आप को नियंत्रित कर ले। तेरे क्रोध-आवेश का दमन-शमन कर ले।”

सेचनक समज गया और सामने चलकर राजा श्रेणिक के सामने नतमस्तक खड़ा हो गया। श्रेणिक राजा भी खुश हुए और आभूषणो से सेचनक का श्रुंगार करवाया!

सीख: पराधीनता से सजा भुगतने के बजाय स्वयं के ज्ञान, विवेक से अपने मन को अंकुश मे रखना श्रेष्ठ है।