बुराई से अधिक अच्छाई पर ध्यान दे.

एक जंगल में दो काफी ऊंचे और घने वृक्ष थे। उनके नीचे वन के हिंसक जीव प्राय: आकर बैठते थे। शेर, चीता, भालू, बाघ आदि ये सभी शिकार मारकर लाते और उन वृक्षों के नीचे बैठकर खाते थे। इस कारण वहां हड्डियां बिखरी रहतीं और गंदगी फैल जाती। 

एक दिन एक वृक्ष ने दूसरे वृक्ष से कहा – भाई, कुछ ऐसा उपाय करें, जिससे ये हिंसक जानवर यहां न आएं। दूसरा वृक्ष बोला – नहीं, इ…नसे हमारी रक्षा होती है। इनकी वजह से ही हम बचे हुए हैं, क्योंकि मनुष्य इनके भय से हमें काट नहीं पाएगा। किंतु पहला वृक्ष अपनी हठ पर अड़ा रहा। 

वह उपाय सोचता रहा और एक दिन जब आंधी चली तो उसने जोर-जोर से हिलकर अपनी दो-चार मोटी डाल नीचे गिरा दी। इनसे कई हिंसक जीव मर गए और कुछ वृक्ष के उखड़ने के डर से वहां से भाग गए। दूसरे दिन उस वृक्ष ने पहले वृक्ष को अपनी सफलता सगर्व बताई, किंतु पहले वृक्ष ने फिर दुष्परिणाम की बात दोहराई। 

आखिर वही हुआ। एक दिन दो व्यक्ति आए और उन्होंने दोनों वृक्षों को काटकर गिरा दिया। तब पहले वृक्ष ने दूसरे से कहा – देखा, आज हमारा ये हाल उन जीवों के जाने से हुआ है। यदि वे हमारी छाया में होते, तो हमें कोई नहीं काट सकता था। दूसरे वृक्ष के पास अब सिवाय पछताने के कुछ नहीं बचा था। 

कथा का निहितार्थ यह है कि बुराई से अधिक अच्छाई पर ध्यान देने के बेहतर परिणाम मिलते हैं। इसलिए अविचारित हठ नहीं करना चाहिए और अच्छाई को ग्रहण करते हुए बुराई को हटाने के प्रयास करने चाहिए।