बापू की छोटी पेंसिल

गांधीजी की नन्ही पेंसिल बच्चों को सिखाती है कि छोटी चीजें भी कीमती होती हैं और हमें कुछ भी व्यर्थ नहीं करना चाहिए।

यह शिक्षाप्रद कहानी मोहन की एक बहुत छोटी पेंसिल से शुरू होती है, जिसे दूसरे लोग बेकार समझते हैं। लेकिन मोहन उसे संभालकर रखता है, क्योंकि वह मानता है कि जो चीज अभी काम की है, उसे फेंकना नहीं चाहिए। पेंसिल के खोने और फिर मिलने की इस सरल घटना में मेहनत, जिम्मेदारी, सादगी और संसाधनों की कदर का बड़ा संदेश छिपा है। आगे चलकर यही मोहन महात्मा गांधी, यानी बापू, बनते हैं। कहानी बच्चों को बताती है कि छोटी आदतें ही बड़े चरित्र का निर्माण करती हैं।

मोहन के हाथ में पेंसिल इतनी छोटी थी कि उंगलियों के पीछे छिप जाती थी। वह पुरानी थी, नोक कुंद थी, और पीछे रबर भी नहीं था, फिर भी मोहन उसे प्यार से संभालता और सलीके से लिखता था।

एक सुबह उसका मित्र हँसकर बोला, 'इतने से ठूँठ को क्यों रखे हो? इसे फेंको और नई चमचमाती पेंसिल लो!' मोहन बस मुस्कुराया।

मोहन ने कहा, 'यह अब भी लिखती है। छोटी चीजों की बड़ी कीमत होती है।' उसने धीरे से साफ अक्षर लिखा। उसका मित्र चकित होकर पलकें झपका गया।

उस दोपहर वह छोटी पेंसिल गायब हो गई। मोहन ने किताबों के नीचे, अपनी चटाई के पास और धूप वाली खिड़की के आसपास देखा, पर वह ठूँठ मिल नहीं पाया।

उसका मित्र बोला, 'इतनी मेहनत क्यों? वह तो बस पेंसिल है।' मोहन ने उत्तर दिया, 'यह काम की और प्यारी है, कचरा नहीं।'

मोहन ने आगे कहा, 'इसे बनाने में लोगों ने मेहनत की है, और मेरे माता-पिता ने पैसे दिए हैं। अगर मैं अभी छोटी चीजें बरबाद करूँगा, तो बाद में बड़ी चीजें भी यूँ ही गँवा दूँगा।' दोस्त ने सिर हिलाया और फिर से खोजने लगा।

आखिरकार उन्हें पेंसिल एक कॉपी के नीचे मिल गई। मोहन ने हँसकर लिखना शुरू किया। मित्र ने धीरे से कहा, 'इस छोटे से टुकड़े ने मुझे बहुत बड़ी बात सिखा दी!'

मोहन ने सिर हिलाया, 'दिल खुला रहे तो हर चीज सिखाती है।' दोस्त मुस्कराया और अपनी छोटी क्रेयॉन को जेब में सहेज लिया।

साल गुज़रते गए। मोहन महात्मा गांधी बने, सच, दया और सादगी के प्यारे नेता। लोग उन्हें 'बापू' कहने लगे, जिसका मतलब होता है पिता।

बापू ने भारत को बिना हथियारों के आज़ादी दिलाने में मदद की। उन्होंने दिखाया कि शांत शब्द और साहसी दिल लड़ाई से ज़्यादा ताकतवर होते हैं।

बहुत प्रसिद्ध होने पर भी वे छोटी चीजों का ध्यान रखते—छोटी पेंसिल, सादा खाना, सच्चा शब्द, कोमल काम। छोटी-छोटी पसंद ही दुनिया बनाती है।

बड़े सबक छोटी जगहों में छिपे होते हैं। जो कुछ पास है उसे सँभालकर इस्तेमाल करो, कभी व्यर्थ न करो, तब छोटी चीजें तुम्हें मजबूत बनाएँगी।

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