कृष्ण की मिट्टी वाली शरारत
गोकुल में खेलते-खेलते कृष्ण के मिट्टी खाने की शिकायत होती है। जब माँ यशोदा उनसे मुँह खोलने को कहती हैं, तो उन्हें भीतर पूरा ब्रह्मांड दिखाई देता है—और माँ का प्रेम और भी गहरा हो जाता है।
यह पौराणिक कहानी गोकुल की एक चंचल सुबह से शुरू होती है, जहाँ कृष्ण, बलराम और उनके दोस्त मिट्टी से घर बनाते हुए खेल रहे हैं। तभी शिकायत उठती है कि कृष्ण ने मिट्टी खा ली। माँ यशोदा प्यार और सख्ती के साथ सच जानना चाहती हैं। लेकिन जब कृष्ण अपना मुँह खोलते हैं, तो मिट्टी की जगह यशोदा को सूरज, चाँद, तारे, नदियाँ, पहाड़, गोकुल और स्वयं अपना दर्शन होता है। शरारत, आश्चर्य और ममता से भरी यह कथा कृष्ण की लीला और माँ यशोदा के असीम प्रेम को उजागर करती है।
गोकुल की एक सुनहरी सुबह, कृष्ण, बलराम और उनके दोस्त बाहर खेल रहे थे। गर्म धूप घास को चूम रही थी, शांत गायें जुगाली कर रही थीं, और हँसी से गाँव का आसमान गूंज रहा था।
बच्चे इधर-उधर दौड़ते रहे और गीली मिट्टी थपथपाकर छोटे-छोटे घर बनाते रहे। उनकी कल्पना में ये टेढ़े-मेढ़े घर चमकते महल और भव्य राज्य बन गए।
कृष्ण के गोल-गोल गाल थे, आँखों में चमक थी, और शरारती मुस्कान फैल गई। सब जानते थे कि इस चमक का मतलब है कोई नया विचार—और शायद थोड़ी शरारत—आ रही है!
अचानक एक लड़का चिल्लाया, 'मैय्या, देखो! कृष्ण मिट्टी खा रहा है!' सारे बच्चे चौंक कर कृष्ण की ओर मुड़े, उनकी आंखें हैरानी और उत्साह से फैल गईं।
माँ यशोदा कमर पर हाथ रखे जल्दी से आईं। 'कृष्णा, मेरे बेटे, क्या तुमने मिट्टी खाई?' उन्होंने सख्ती से पूछा, लेकिन आवाज में प्यार अभी भी था।
कृष्ण ने मासूम आँखों से ऊपर देखा। 'नहीं, मैय्या,' उसने मीठी आवाज में कहा, 'मैंने बिलकुल मिट्टी नहीं खाई।'
बलराम आगे आए और उंगली से दिखाया। 'उसने खाई! हमने सबने उसे मुँह में डालते देखा,' उन्होंने बड़े भाई की सच्चाई से कहा।
यशोदा घुटनों के बल बैठीं, कृष्ण की ठुड्डी पोछी और धीरे से बोलीं, 'मुँह खोलो, कन्हा।' कृष्ण ने सिर हिलाया, बिलकुल शरमीले बिलौटे की तरह।
'कृपया, खोलो,' उन्होंने फिर कहा। कृष्ण ने धीरे-धीरे होंठ खोले। यशोदा ने अंदर झांका—और वहाँ जरा सी भी मिट्टी नहीं थी।
इसके बदले यशोदा ने देखा कि विशाल ब्रह्मांड घूम रहा है। चमकता सूरज, ठंडी चाँदनी और टिमटिमाते तारे उसके छोटे से मुँह के अंदर तैर रहे थे!
उसे नदियाँ, पहाड़, बादल, जानवर और लोग दिखे—यहाँ तक कि पूरा गोकुल भी। उसने खुद को भी उस जादुई मुँह में झांकते हुए देखा।
यशोदा की साँस रुक गई। 'यह बालक कौन है?' उन्होंने सोचा। कृष्ण ने बस अपनी खिलखिलाती, प्रेम भरी मुस्कान से उत्तर दिया।
उस मुस्कान में उन्हें याद आया: यह तो मेरा कन्हा है, मेरा नन्हा बेटा। उन्होंने उसे गोद में उठा लिया और पहले से भी ज्यादा कसकर गले लगाया।
उन्होंने धीरे से कहा, 'चाहे तुम्हारे मुँह में सारी दुनिया हो या बस मिठाई, लेकिन मिट्टी कभी मत खाना।' कृष्ण खिलखिलाया, उसकी आँखों में वादा चमक उठा।
उस दिन के बाद, जब भी दोस्त कोई शरारत बताने आते, यशोदा पहले खुद देखकर परखती। क्योंकि वह जानती थी, उसकी गोद में पूरा ब्रह्मांड छिपा हो सकता है।