बंदर मामा चले बाज़ार
एक चुलबुली हिंदी संगीतमय कहानी, जिसमें बंदर मामा बाज़ार से आम लाते हैं। तेज हवा से आम बिखर जाते हैं, फिर तोता और गिलहरी मिलकर उन्हें समेटते हैं और सब मिल-बाँटकर खुशी मनाते हैं।
यह प्यारी हिंदी तुकबंदी वाली कहानी बंदर मामा की बाज़ार यात्रा को गाने-गुनगुनाने के अंदाज़ में सुनाती है। टोपी और गोल चश्मा पहने बंदर मामा आमों की टोकरी लेकर लौटते हैं, लेकिन तभी तेज हवा उनके थैले को उड़ा देती है और आम इधर-उधर बिखर जाते हैं। मुश्किल की घड़ी में तोता और गिलहरी मदद के लिए आ जाते हैं। मिलकर सब आम उठाए जाते हैं, फिर सब साथ बैठकर आम खाते हैं और खुशियाँ बाँटते हैं। कहानी सहयोग, दोस्ती और मिल-बाँटकर रहने की भावना को सरल और आनंदपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करती है।
बंदर मामा चले बाज़ार, चले बाज़ार, चले बाज़ार, टोपी पहन, हुए तैयार, बंदर मामा चले बाज़ार।
डोलम-डोलम चलते जाएँ, चलते जाएँ, चलते जाएँ, चश्मा गोल चमकता जाए, बंदर मामा मुस्काएँ।
आम की खुशबू आई प्यारी, आई प्यारी, आई प्यारी, मामा बोले, “वाह रे भाई! ले लूँ आमों की टोकरी सारी!”
एक आम, दो आम, तीन आम, चार, पाँचवाँ आम भी हुआ तैयार। थैले में सब आम सजाए, बंदर मामा नाचते जाएँ।
तभी चली हवा—सर्र सर्र सर्र! थैला उड़ा—फर्र फर्र फर्र! आम लुढ़के—घर्र घर्र घर्र! मामा दौड़े—जल्दी कर!
आम इधर और आम उधर, मामा दौड़े इधर-उधर। तोता आया, गिलहरी आई, दोनों बोले, “हम हैं भाई!”
उठाओ आम, उठाओ आम, मिलकर सारे उठाओ आम। एक तुम्हारा, एक हमारा, बाँटें मिलकर आम दोबारा।
मामा बोले, “वाह रे भाई! मिलकर हमने जीत है पाई!” आम सभी ने मिलकर खाए, हँसते-गाते घर को आए।
बंदर मामा चले घर आज, चले घर आज, चले घर आज, गाते जाएँ एक ही बात— “मिल-बाँटकर खुशियाँ बढ़ाएँ साथ!”