डेज़ी बत्तक का कीचड़ नाच

डेज़ी बत्तक को लगता था कि बारिश खेल बिगाड़ देती है, लेकिन दादी बत्तक के साथ पोखरों में छप-छप करते हुए वह सीखती है कि बरसाती दिन भी खुशी, खेल और नए नजरिए से चमक सकते हैं।

डेज़ी बत्तक को धूप वाले दिन बहुत पसंद थे और बारिश उसे उदास कर देती थी। एक दिन, जब वह खिड़की से बाहर टप-टप सुनते हुए मायूस बैठी थी, दादी बत्तक पीले बूट और नीली रेनकोट के साथ एक मजेदार योजना लेकर आईं। पहले डेज़ी हिचकिचाई, लेकिन बाहर जाकर उसने देखा कि हर पोखर में खेल छुपा है। दादी के साथ छप-छप, घूमते और हँसते-हँसते डेज़ी का मन बदल गया। यह कहानी बच्चों को सिखाती है कि कभी-कभी नया नजरिया अपनाने से उदास दिन भी मजेदार बन सकते हैं।

डेज़ी बत्तक एक प्यारे से खेत में रहती थी। उसे गर्म धूप बहुत पसंद थी, मगर घने बादल आते ही वह कराहती। डेज़ी को लगता था कि बारिश खेल बिगाड़ देती है और पंख भिगो देती है, इसलिए वह चाहती थी कि हर बूँद जल्दी चली जाए।

एक धूसर सुबह, बारिश ने छत पर टप-टप छोटे ड्रम बजाए। डेज़ी ने चोंच खिड़की से सटाई और आह भरी, 'न टैग, न छुपन-छुपाई, बस टप, टप, टप।' उसे घर में फँसा और अकेला महसूस हुआ।

बारिश बरसती रही। डेज़ी कंधे झुका कर बुदबुदाई, 'फिर से उदास दिन।' तभी धीरे से दादी बत्तक की हल्की क्वैक सुनाई दी, जो चमकीला, छपछपा आइडिया लेकर चली आ रही थीं।

दादी ने चमचमाते पीले बूट और नीली रेनकोट पकड़ी थी। उनकी आँखें चमक रही थीं। 'आओ, डेज़ी,' उन्होंने प्यार से कहा। 'चलो बारिश से मिलते हैं!' डेज़ी पलकें झपकाती रही, समझ न सकी दादी इतनी मुस्कुरा क्यों रही हैं।

'बाहर? इस रिमझिम में?' डेज़ी ने चूँ-चूँ की। 'हम भीग जाएँगे!' दादी हँसीं, 'भीगना तो मज़े का आधा हिस्सा है, मेरी नन्ही बतक। मुझ पर भरोसा करो और मेरे छप-छप प्लान के साथ चलो।'

डेज़ी ने बूट पहने, कोट लगाया और दादी के पीछे चल पड़ी। जैसे ही वे कीचड़ भरे आँगन में उतरीं, ठंडी बूँदें उसकी चोंच को चूमने लगीं। हर पोखर में एक रोमांच छुपा था।

बारिश ने सबकुछ चमका दिया था। पत्ते पानी की हँसी से हिल रहे थे और रास्ते पर दर्पण जैसे डब्बे थे। डेज़ी ने चेतावनी दी, 'सावधान दादी, डबके गंदे हैं, हम फिसल सकते हैं!'

दादी बादलों जैसी मुलायम हँसी हँसीं। उन्होंने एक जालीदार पैर उठाया और–छप्पाक! पानी ऊँचा उछला। डेज़ी ने आँखें फैलाईं, 'दादी, आपने तो झील बना दी!' बूँदें डेज़ी के पंखों को गुदगुदाने लगीं।

दादी ने शाही झुकाव किया। 'यह तो मेरी वॉर्म-अप थी,' उन्होंने चुटकी ली, फिर दूसरा पैर पटका—छप-छप! चाँदी जैसी फुहारें चमक उठीं। डेज़ी खिलखिलाई; अब बारिश उदास नहीं लगी।

अब उत्साहित होकर, डेज़ी ने अपना पैर उठाया। प्लिप! पानी का नन्हा मुकुट उठा। उसने ज़ोर से पैर पटका—छप्पाक! डबका नाच उठा और डेज़ी की मुस्कान खलिहान के दरवाज़े जितनी चौड़ी हो गई।

जल्दी ही वे एक डबके से दूसरे में कूदने लगीं। 'बायाँ पैर!' दादी ने पुकारा। 'दायाँ पैर!' डेज़ी हँसी। वे घूमीं, पंख फड़फड़ाए और डुलीं, क्वैक-स्पिन और रेनड्रॉप-विगल का नाच बन गया।

'देखो दादी! मेरा कीचड़ नाच!' डेज़ी ने खुशी से कहा। वे तब तक घूमीं जब तक बारिश हल्की न हो गई और बाड़ के ऊपर एक नन्हा इंद्रधनुष झाँकने लगा, रंग-बिरंगे वादे की तरह चमकता।

थकी लेकिन खुश, दोनों बतखें अंदर फड़फड़ाती हुई आईं, पीछे छोटे गीले पैरों के निशान छोड़ते हुए। दादी ने डेज़ी को तौलिये में लपेटा और पूछा, 'तो, कैसा रहा तुम्हारा बारिश भरा दिन, नन्ही?'

डेज़ी के गाल चमक उठे। 'कमाल!' वह क्वैक की। 'बरसाती दिन उबाऊ नहीं हैं। ये तो कीचड़ नाच के लिए बने हैं!' दादी ने उसे गले लगाया, नई बारिश-प्रेमी पर गर्व हुआ।

जब भी बारिश की टिप-टिप सुनाई देती, डेज़ी अपने बूट और कोट के लिए दौड़ती, फुसफुसाती, 'मेरे कीचड़ नाच का समय!' अब कभी भी बादल उसकी छप-छप खुशी को चुप नहीं करा पाए।

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