गिगी बकरी का टेढ़ा सींग

गिगी अपने टेढ़े सींग को लेकर परेशान रहती है, लेकिन जब वही सींग दोस्तों की खुजली मिटाने में काम आता है, तो उसे समझ आता है कि अलग होना भी एक खास उपहार हो सकता है।

गिगी बकरी के दो छोटे सींग हैं—एक सीधा और एक थोड़ा टेढ़ा। वह सोचती रहती है कि उसके दोनों सींग एक जैसे क्यों नहीं हैं। दोस्तों के बीच भी वह अपना सिर छुपाती है, क्योंकि उसे डर है कि सब उसके मुड़े हुए सींग पर हँसेंगे। लेकिन एक दिन, जब टुटू बकरी की पीठ में बहुत खुजली होती है और कोई मदद नहीं कर पाता, तब गिगी अपने टेढ़े सींग से उसकी मदद करती है। वही सींग, जिसे वह अपनी कमी समझती थी, सबके लिए काम का साबित होता है। इस प्यारी कहानी में गिगी सीखती है कि हमारी भिन्नताएँ हमें खास, मददगार और प्यारा बनाती हैं।

गिगी बकरी के दो छोटे सींग थे। एक ऊँचा और बिलकुल सीधा खड़ा था। दूसरा छोटे हुक की तरह थोड़ा झुका हुआ था। वह टूटा हुआ या गलत नहीं था। वह बस थोड़ा टेढ़ा था।

हर सुबह गिगी तालाब में झाँकती। वह आह भरती, 'मेरे दोनों सींग एक जैसे क्यों नहीं हैं?' पानी लहराता, और उसकी चिंता भी हिलती-डुलती।

धूप वाली पहाड़ी पर उसके दोस्त कूदते और हँसते रहे। गिगी भी गई, पर उसने अपना सिर छुपा लिया। 'क्या सब मुझे घूरेंगे?' उसने सोचा। 'क्या वे मेरे मुड़े हुए सींग पर हँसेंगे?'

एक हवा भरी दोपहर बकरियाँ नरम हरी घास पर दौड़ने लगीं। बादल रुई जैसे तैर रहे थे और हवा में खिलखिलाहट गूँज रही थी।

अचानक टुटू बकरी एक नीचे झुके पेड़ के नीचे रुक गई। 'ओह! मेरी पीठ बहुत खुजली कर रही है!' वह कराहते हुए दाएँ-बाएँ मुड़ी। पेड़ की छाल भी उस जगह तक नहीं पहुँच पा रही थी।

दोस्त मदद करने दौड़े। किसी ने खुर से खुजाया। किसी ने नाक से धक्का दिया। किसी ने डंडी से टोका। कुछ भी काम नहीं आया। खुजली बनी रही और टुटू कीड़ा जैसा मचलता रहा।

गिगी चुपचाप देख रही थी। फिर उसने देखा कि उसका मुड़ा सींग तो छोटे पीठ खुजाऊ जैसा दिखता है। शायद यह मदद कर सकता है!

उसने हिम्मत दिखाई। 'मैं कोशिश कर सकती हूँ,' वह फुसफुसाई। गिगी ने अपना टेढ़ा सींग ठीक से लगाया और रगड़-रगड़-रगड़, ठीक उसी जगह खुजली कर दी।

'आह, अब ठीक है!' टुटू ने राहत की साँस ली। बाकी बकरियाँ खुशी से चिल्लाईं। 'गिगी, तुम्हारा सींग तो कमाल है!' वे आश्चर्य से चमकती आँखों से बोले।

गिगी के मन में खुशी और गर्व उमड़ आया। उसका सींग अजीब नहीं था—वह तो काम का था! जल्दी ही एक छोटी सी कतार लग गई। हर दोस्त को हल्की खुजाई और एक बड़ी मुस्कान मिली।

और बकरियाँ उछलती हुई आ गईं। 'मेरा कान खुजला रहा है!' 'मेरा कंधा भी!' गिगी हँसी और एक-एक करके सबकी मदद की, जब तक कि सभी आराम से न मुस्कुराए।

उस शाम दोस्तों ने उसे 'महान गिगी खुजाऊ बकरी' कहा! वह तालाब में झाँकी तो उसे मुस्कुराती हुई बकरी बहुत गर्वित दिखी।

एक सींग सीधा, एक सींग टेढ़ा, दोनों ही प्यारे। अब गिगी जान गई कि अलग होना उसे खास, मददगार और सबका प्यारा बनाता है।

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