लीला हिरणी की हवा पर सवार इच्छा
एक शांत हिरणी अपनी चिंताएँ हवा से कहती है, बहादुर इच्छाएँ माँगती है और खरगोश के साथ बड़े टीले पर चढ़ने का साहस जुटाती है। यह प्रकृति और भावनाओं पर आधारित एक शैक्षिक कहानी है।
लीला एक नन्ही, शांत हिरणी है जिसे पेड़, पत्ते और चमकती धाराएँ पसंद हैं, लेकिन अँधेरे रास्ते, रात की हवा और नई चीज़ें उसे डरा देती हैं। जब खरगोश उसे बड़े टीले पर खेलने बुलाता है, तो उसकी चिंताएँ और बढ़ जाती हैं। एक पुराने पेड़ के नीचे खड़ी लीला अपनी बातें हवा से फुसफुसाकर कहती है। हर 'हूश' के साथ उसका डर हल्का होने लगता है। फिर वह एक बहादुर इच्छा करती है—शांत दिल, बहादुर कदम और डर के बावजूद कोशिश करने का साहस। यह कोमल कहानी बच्चों को बताती है कि अपनी चिंताओं को बोल देना उन्हें हल्का कर सकता है, और प्रकृति में भी हिम्मत पाने का सहारा मिल सकता है।
लीला नन्ही और शांत थी। उसे ऊँचे पेड़, झूमते पत्ते और धूप में खिलखिलाती चमकती धाराएँ बहुत पसंद थीं।
लीला को रात की हवा, अँधेरे रास्ते और नई चीज़ों से डर लगता था। उसकी चिंताएँ उसे सीने में रखे भारी पत्थर जैसी लगती थीं।
एक हल्की हवा वाली सुबह, लीला ने घास को लहराते देखा। तभी खरगोश फुदकता हुआ आया और बोला, 'मेरे साथ बड़े टीले पर खेलने चलो!'
लीला ने उस ऊँचे, चौड़े टीले को देखा। वह बुदबुदाई, 'अगर मैं गिर गई तो? अगर मैं खो गई तो? अगर मैं साथ नहीं चल पाई तो?'
खरगोश उछलता हुआ आगे चला गया। लीला ने एक पुराने पेड़ के नीचे लंबी साँस ली। हल्की हवा ने पत्ते सरसराए, फूलों को गुदगुदाया, और एक अकेला पंख उसके चारों ओर घुमाया।
लीला ने ऊपर देखा और फुसफुसाई, 'काश मुझे हर समय चिंता न होती।' हवा ने एक लंबा 'हूश' करते हुए उसकी नाक के पास से मुलायम झोंका बहाया।
'क्या तुमने मुझे सुना?' उसने पूछा। पत्ते फिर से 'हूश' करके कांप उठे। ऐसा लगा जैसे हवा ने 'हाँ' कहा हो।
'क्या मैं तुम्हें अपनी चिंताएँ बता सकती हूँ?' लीला ने फुसफुसाया। हवा गोल-गोल नाची, तो उसने एक गहरी, बहादुर साँस भरी।
'मुझे बड़े टीले से डर लगता है,' उसने कहा। हूश। 'मुझे गलती करने से डर लगता है।' हूश। 'मुझे पीछे छूट जाने से डर लगता है।' हर 'हूश' के साथ उसकी एक चिंता आसमान की ओर उड़ गई।
अब उसका सीना में रखा पत्थर छोटा लगने लगा। 'शायद मैं तुम्हें एक इच्छा भी बता सकती हूँ,' उसने कहा। हवा घास में फड़फड़ाई, मानो इंतज़ार कर रही हो।
लीला ने आँखें बंद कीं। 'मैं बहादुर कदम, शांत दिल और डर के बावजूद कोशिश करने का साहस चाहती हूँ।' हवा ने उसे नरम जंगल की बाँहों की तरह गले लगा लिया।
जब उसने आँखें खोलीं, टीला अब भी ऊँचा था, लेकिन लीला अपने भीतर ऊँची महसूस कर रही थी। अब वह टीला इतना बड़ा नहीं लग रहा था।
उसने एक कदम बढ़ाया, फिर दूसरा, फिर तीसरा। ऊपर पहुँचकर खरगोश ने खुशी से हाथ हिलाया और कूदने लगा।
'तुम आ गई!' खरगोश ने खुशी से कहा। लीला मुस्कुराई और बोली, 'हाँ, मैं आ गई।' उसका दिल हल्का और चमकीला लगा।
उस शाम लीला घास के मैदान में खड़ी थी। जब भी चिंताएँ जोर से आतीं, वह उन्हें हवा को फुसफुसाती, और अपनी हर नई बहादुर इच्छा भी बताती।
उसने एक राज़ सीखा: चिंताओं को बोल देने से वे हल्की हो जाती हैं, और हवा पर सवार इच्छाएँ हिम्मत को बढ़ाती और चमकाती हैं।