बगीचे में गड्ढा: दो दोस्तों की प्रकृति और छोटे खजानों वाली कहानी
दो दोस्त खजाने की तलाश में बगीचे में गड्ढा खोदते हैं, लेकिन उन्हें समझ आता है कि असली खजाना सोना नहीं, बल्कि मिट्टी, कीड़े, पौधे और आसपास की छोटी-छोटी अद्भुत चीज़ें हैं।
यह एक सौम्य और शैक्षिक प्रकृति-कथा है जिसमें अभिद्न्या और वीर खजाना ढूंढने के उत्साह में बगीचे में गड्ढा खोदते हैं। उन्हें सोने का संदूक या ताज नहीं मिलता, लेकिन रास्ते में नीला बटन, कीचड़ लगा चम्मच, हरी कंचा, टूटी चूड़ी, केंचुआ, चींटियाँ, तितली, भृंग और गिलहरी जैसी कई रोचक चीज़ें दिखाई देती हैं। कहानी बच्चों को दिखाती है कि प्रकृति के छोटे-छोटे दृश्य और साधारण वस्तुएँ भी आश्चर्य, सीख और सुंदर यादों से भरी हो सकती हैं।
हर शनिवार को अच्छे दोस्त अभिद्न्या और वीर उसके बगीचे में मिलते हैं। वहाँ एक अमरूद का पेड़, चमकीले गेंदे के फूल, पत्थर की पगडंडी और एक नर्म मिट्टी का शांत कोना है।
एक धूप वाले दिन वीर हरे रंग का छोटा फावड़ा लेकर भागता हुआ आया। 'चलो, गड्ढा खोदते हैं!' वह खुशी से बोला।
अभिद्न्या ने पलक झपकाई। 'क्यों खोदें?' वीर मुस्कुराया, 'कुछ कमाल की चीज़ खोजने के लिए!'
अभिद्न्या ने चौंक कर कहा, 'शायद खजाना!' 'या कोई चमकता ताज,' वीर ने जोड़ा। 'या फिर बड़े डाइनोसॉर की हड्डियाँ!'
उन्होंने अमरूद के पेड़ के पास एक जगह चुनी। खोद, खोद, खोद—उनके फावड़े चलते गए और भूरे मिट्टी के कण उड़ते गए।
थोड़ी ही देर में अभिद्न्या को नीला सा छोटा बटन मिला। उसने धीरे से कहा, 'यह किसी रानी की पोशाक का हो सकता है।' वीर हँस पड़ा, 'या फिर स्कूल की कमीज़ का!'
उन्होंने बटन को एक कटोरी में रखा। ठक! वीर का फावड़ा किसी सख्त चीज़ से टकराया। 'खजाना?' वह चिल्लाया। वह तो बस पुराना कीचड़ लगा चम्मच था।
फिर अभिद्न्या को एक चमकदार हरी कंचा मिली। वह उसे देख ही रही थी कि एक मोटा केंचुआ निकल आया। वीर चीं कर के पीछे कूद गया।
अभिद्न्या हँस पड़ी, 'हमने इसका घर तोड़ दिया।' उन्होंने धीरे से केंचुए को गेंदे के पास की नरम मिट्टी में रख दिया।
फिर खोदते-खोदते उन्हें छोटे कंकड़, सूखी जड़ें और चूड़ी का टूटा हिस्सा मिला। एक घमंडी भृंग राजा की तरह चलते हुए चला गया।
लेकिन सोने का संदूक, ताज या डाइनोसॉर की हड्डियाँ नहीं मिलीं। थक कर अभिद्न्या अमरूद के पेड़ के नीचे बैठ गई और आह भरी।
'मैंने कुछ अद्भुत सोचा था,' उसने कहा। वे अपनी कटोरी देखने लगे: नीला बटन, कीचड़ लगा चम्मच, हरी कंचा, टूटा चूड़ी का टुकड़ा।
'हमने तो चीज़ें ढूंढ लीं,' वीर बोला। 'पर खजाना नहीं,' अभिद्न्या ने धीरे से कहा। तभी उसकी माँ ने आवाज़ दी, 'आओ, मीठे अमरूद खाओ!'
रास्ते में उन्होंने लाल चींटियों की कतार देखी जो रोटी के टुकड़े ले जा रही थीं। एक बहादुर चींटी अपने सिर से बड़ा टुकड़ा उठा रही थी।
उनके ऊपर एक पीली तितली गेंदे पर बैठी थी, और एक फुर्तीला गिलहरी दीवार पर अमरूद का पत्ता लेकर भाग रही थी।
धूप ने अभिद्न्या के हाथ की हरी कंचे को चमका दिया। वह मुस्कुरा कर बोली, 'शायद बगीचा पहले से ही खजाने से भरा था।'
वीर ने सिर हिलाया, 'हम नीचे ही देखते रहे, इसलिए असली खजाना लगभग छूट गया।'
उस शाम अभिद्न्या ने अपनी खिड़की पर ये सब चीज़ें सजा दीं। वे सोना तो नहीं थीं, लेकिन हर एक में खुश याद छिपी थी।
ये छोटी-छोटी चीज़ें उसे उस दिन की याद दिलाती रहीं जब उसने और वीर ने मिलकर बगीचे का छुपा जादू खोजा था।