दया की वेंडिंग मशीन
स्कूल में आई एक चमचमाती मशीन बच्चों को सिखाती है कि असली जादू खिलौनों में नहीं, नेक कामों में छिपा है। हर दयालु काम पर मिलता है एक छोटा-सा सरप्राइज़ और बड़ी-सी सीख।
स्कूल के हॉल में एक दिन एक अनोखी मशीन दिखाई देती है, जिस पर लिखा है, "सिक्के नहीं, बस नेक काम!" आरुष और आर्या पहले खिलौनों की उम्मीद करते हैं, लेकिन जल्द ही समझ जाते हैं कि यह मशीन तभी कुछ देती है जब कोई सचमुच दयालु काम करे। किसी की किताबें उठाने में मदद करना, प्यासे बच्चे को पानी देना, दरवाज़ा पकड़ना, चीजें बाँटना, या किसी उदास दोस्त को साथ खेल में बुलाना—हर छोटे नेक काम के साथ मशीन एक स्टीकर, रबर या प्यारा संदेश देती है। धीरे-धीरे बच्चों को एहसास होता है कि असली इनाम मशीन से मिलने वाली चीजें नहीं, बल्कि दूसरों के चेहरों पर आई खुशी है। यह कहानी बच्चों को बताती है कि दयालुता कोई बड़ी या कठिन चीज नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के छोटे कामों में छिपी एक सच्ची सुपरपावर है।
सोमवार की बात है। स्कूल के हॉल के एक कोने में एक लंबी, चमचमाती मशीन दिखाई दी। उस पर चमकीले शब्द जगमगा रहे थे, 'काइंडनेस वेंडिंग मशीन। सिक्के नहीं, बस नेक काम!'
'वाह!' आरुष बोला। उसने चमकदार बटन दबाया, खिलौना मिलने की उम्मीद की। कुछ नहीं गिरा। 'हम्म, शायद यह खराब है,' वह उदास हो कर बोला।
स्क्रीन टिमटिमाई। 'कृपया एक नेक काम दर्ज करें।' आर्या ने सिर खुजलाया। 'नेक काम? हम क्या करें?' उसने सोचा।
तभी एक अध्यापिका किताबों के भारी डिब्बे को संभालते हुए आ रहीं थीं। आर्या दौड़कर गई और बोली, 'मैं मदद करती हूँ!' दोनों ने मिलकर भारी डिब्बा लाइब्रेरी तक पहुँचाया।
आर्या वापस आई तो मशीन टनटनाई। 'नेक काम मिला!' एक चमचमाता स्टीकर निकला, जिस पर लिखा था, 'मदद के लिए धन्यवाद!'
आरुष की आँखें चमक उठीं। 'अब मेरी बारी!' उसने तेजी से बटन दबाए, पर स्क्रीन पर लिखा आया, 'सिक्के नहीं। सिर्फ अच्छे काम।'
उसने इधर-उधर देखा। एक छोटा लड़का ऊँचा नल नहीं पहुँच पा रहा था। आरुष ने एक कप भरा और उसे दे दिया। लड़का हँसते हुए बोला, 'धन्यवाद!'
मशीन के पास लौटते ही खुशियों भरी 'डिंग' हुई। एक नन्हा सितारा-सा रबर बाहर आ गया। स्क्रीन ने झपकी ली, 'पानी बाँटने का बढ़िया काम!'
दिन-प्रतिदिन बच्चे नई-नई तरह से दयालु बनते रहे—दरवाज़ा पकड़ना, क्रेयॉन बाँटना, अकेले दोस्त को खेल में बुलाना, और 'सॉरी' या 'शाबाश' कहना।
कभी-कभी मशीन तोहफे की जगह चिट्ठी भेजती थी: 'तुमने आज किसी को हँसाया!' 'तुम्हारी दयालुता तुम्हारी सुपरपावर है!' 'दुनिया तुम्हारी वजह से और रोशन है।'
एक दोपहर स्क्रीन अंधेरी हो गई। फिर नए शब्द चमके: 'अब तुम्हें मेरी जरूरत नहीं। तुम दयालु होना सीख चुके हो। बस यूँ ही आगे बढ़ते रहो!'
आरुष ने चारों तरफ देखा। उसने एक बच्चे को दोस्त का जूता बाँधते, दो बच्चों को नाश्ता बाँटते, और किसी को गिरे साथी को प्यार से गले लगाते देखा।
आर्या मुस्कुराई। 'देखो, असली इनाम तो खुश चेहरे हैं!' मशीन ने सिर्फ याद दिलाया। दयालुता तो शुरू से ही उनके दिल में थी।